पंचायत भूमि मालिकाना हक, हरियाणा हलचल स्पेशल – हरियाणा की नायब सैनी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने अपने ही साल 2022 के एक फैसले को पलटते हुए गाँव की ‘बचत भूमि’ (Bachat Land) पर जमींदारों के मालिकाना अधिकार को मंजूरी दे दी है। इस ऐतिहासिक फैसले में चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 2003 के एक फैसले को अब बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि चकबंदी के दौरान सामूहिक प्रयोजनों के लिए चिन्हित नहीं की गई अतिरिक्त जमीन ग्राम पंचायत की नहीं, बल्कि उन मालिक जमींदारों की होगी, जिन्होंने मूल रूप से इस जमीन को दिया था।
देखा जाए तो यह फैसला हजारों हरियाणा के जमींदारों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, जो दशकों से इस जमीन पर अपना दावा कर रहे थे। वहीं, दूसरी ओर, इससे हरियाणा सरकार और ग्राम पंचायतों की इन जमीनों को लेकर योजनाओं पर पानी फिर गया है, जो इन जमीनों को सार्वजनिक उपयोग में लाना चाहती थीं।
पंचायत की इस जमींन का जानें क्या है पूरा मामला?
मामला की जड़ें पंजाब और हरियाणा में चकबंदी (जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक जगह इकट्ठा करना) की प्रक्रिया में हैं। जो चकबंदी एक्ट, 1948 के तहत, जमींदारों को गाँव के सामूहिक विकास के लिए—जैसे सड़कें, स्कूल, चरागाह, कुएं बनाने हेतु—अपनी जमीन का एक हिस्सा योगदान के रूप में देना पड़ता था। हालाँकि, व्यवहार में, इन सार्वजनिक कार्यों के लिए योगदान की गई पूरी जमीन का इस्तेमाल नहीं हो पाता था। और जो जमीन बच जाती थी, उसे ‘बचत भूमि’ या ‘अनुपयोगी भूमि’ कहा गया।
सवाल यह था कि इस बची हुई जमीन का मालिक कौन है? जमीन के मालिक जमींदारों का दावा था कि चूंकि इस बचत भूमि का सार्वजनिक उपयोग नहीं हुआ, इसलिए यह उन्हें यह वापस मिलनी चाहिए। वहीं, हरियाणा सरकार ने 1992 में पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1961 में संशोधन करके इस बचत भूमि को भी ‘शमीलात देह’ (गाँव की सामूहिक संपत्ति) की परिभाषा में शामिल कर लिया और इसे पंचायतों के हवाले करने का प्रयास किया।
सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत की जमीन को लेकर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में स्पष्ट किया कि कोई भी जमीन स्वचालित रूप से पंचायत की संपत्ति नहीं बन जाती। अदालत ने दो महत्वपूर्ण शर्तें रखीं:
1. स्पष्ट आरक्षण: चकबंदी योजना में यह स्पष्ट रूप से लिखा होना चाहिए कि यह विशेष भूमि सामान्य प्रयोजनों के लिए आरक्षित है।
2. कब्जे का हस्तांतरण: वही रिकॉर्ड में उस भूमि का कानूनी कब्जा वास्तव में पंचायत को सौंपा गया हो।
चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ की पीठ ने माना कि विवादित ‘बचत भूमि’ इन दोनों शर्तों पर खरी नहीं उतरती। इसलिए, यह जमीन पंचायत की बिलकुल नहीं, बल्कि उन मूल जमींदारों की बनी रहेगी, जिन्होंने इसे योगदान दिया था। इस जमीन को उन्हें उनके योगदान के अनुपात में वापस भी बांटा जाना चाहिए।
‘पूर्वनिर्णय के सिद्धांत’ को दिया बल
अदालत ने अपने फैसले में ‘स्तारे देसीसिस’ (stare decisis) के सिद्धांत पर भी जोर दिया। इस सिद्धांत का मतलब है कि अदालतें आम तौर पर पुराने और स्थापित न्यायिक निर्णयों से से बंधी होती हैं ताकि देश के कानून में स्थिरता बनी रहे। सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पिछले 20 वर्षों में 100 से अधिक मामलों में लगातार जमींदारों के पक्ष में फैसला दिया है। इतने लंबे समय बाद इस स्थापित कानूनी स्थिति को बदलना कानूनी अनिश्चितता को पैदा करेगा और लोगों के अधिकारों के प्रति निष्पक्ष नहीं होगा।
इस फैसले का सीधा सा मतलब है कि हरियाणा की वह बचत भूमि, जिस पर पंचायतों और सरकार ने कब्जा कर रखा था या जिसे वे हस्तगत भी करना चाहती थीं, अब उस पर मूल जमींदारों का वैधानिक हक मान लिया गया है। यह फैसला निजी संपत्ति के अधिकारों और सार्वजनिक हित के बीच के जटिल संतुलन पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक उपयोग का दावा करने के लिए सरकार को कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन करना होगा, न कि केवल अधिसूचना जारी करके जमीन पर दावा जताया जा सकता है। यह फैसला हरियाणा और पंजाब की जमीन से जुड़े हजारों मुकदमों का रास्ता साफ कर देगा और यह जमींदारों के लिए एक बड़ी विजय साबित हुआ है।




