गुरुग्राम पुलिस, 27 नवंबर 2025 जिले की ट्रैफिक पुलिया पर इस बार शिकारी और शिकार का रोल उलट गया। दो ठगों ने खुद को “विजिलेंस अधिकारी” बताकर वर्दीधारी जवानों से ही उगाही करने की स्कीम चलाई, लेकिन एक जांबाज जोनल ऑफिसर की शिकायत ने पूरे रैकेट को उजागर कर दिया। मंगलवार को गिरफ्तार दोनों आरोपियों—दीपक (22) व नितिन कुमार (24)—ने स्वीकार किया कि उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कम-से-कम सात पुलिसकर्मियों को डरा-धमका कर रुपये ऐंठने की कोशिश की। पुलिस अब उनके पुराने मुकदमों और नेटवर्क की तह तक जा रही है।
फर्जी अधिकारी बन व्हाट्सऐप पर भेजे धमकी भरे वीडियो
घटना 15 अक्टूबर की शाम की है। मेफील्ड गार्डन ट्रैफिक सिग्नल पर तैनात जोनल ऑफिसर अजय कुमार (बदला हुआ नाम) के अनुसार, “सफेद स्विफ्ट डिजायर में आए दो युवकों ने मुझे रोका और कहा ‘हम विजिलेंस से हैं, आपके खिलाफ शिकायतें आई हैं।’ उन्होंने मुझे पास के पुलिस बूथ में ले जाकर कहा कि ड्यूटी से हटाया जा सकता है।” जब अजय ने लिखित आदेश माँगा, तो दोनों ने कहा “रात में व्हाट्सऐप करते हैं।” रात करीब 11 बजे उन्होंने एक वीडियो भेजा जिसमें धमकी दी गई कि “₹50 हजार दो नहीं तो सस्पेंशन लेटर भेज देंगे।” अजय ने तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया और साइबर सेल में लिखित शिकायत दर्ज कराई।
तकनीकी सर्विलांस और मुखबिरी से पहुँचा पुलिस
गुरुग्राम पुलिस कमिश्नरेट की क्राइम ब्रांच ने व्हाट्सऐप नंबर, कार के चेसिस नंबर और टोल प्लाजा की सीसीटीवी फुटेज खंगाली। डीसीपी (क्राइम) निशा गर्ग ने बताया, “हमने पाया कि दोनों आरोपी अलग-अलग जिलों में एक ही तरीका अपनाते थे। नितिन कुमार नेपाल का रहने वाला है और दिल्ली-एनसीआर में किराए पर कमरा लेकर रहता था। दीपक, चरखी दादरी का रहने वाला है, जो पहले भी दो मामलों में जमानत पर बाहर था।” मंगलवार सुबह सेक्टर-40 के हुडा मार्केट में दोनों जब एक और ट्रैफिक हवलदार से मिलने आए, तो पुलिस टीम ने उन्हें घेर लिया। दौड़ते समय दोनों ने फर्जी विजिलेंस आईडी कार्ड भी दिखाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें धर-दबोचा।
पुलिस की पूछताछ में खुला 7 वारदातों का पिटारा
थाना सेक्टर-40 में दर्ज एफआईआर के मुताबिक, आरोपियों के पास से दो नकली स्टाम्प, तीन मोबाइल, एक लैपटॉप और दो फर्जी विजिलेंस आईडी बरामद हुई हैं। पूछताछ में नितिन ने स्वीकार किया कि वह दिल्ली, उत्तर प्रदेश व हरियाणा में दुष्कर्म, चोरी और आर्म्स एक्ट समेत कुल नौ मामलों में वांछित है। दोनों ने मिलकर गाजियाबाद के एक ट्रैफिक हवलदार से ₹30 हजार, फरीदाबाद से ₹25 हजार और पलवल से ₹20 हजार की ठगी कर चुके हैं। डीसीपी गर्ग ने बताया, “उनका तरीका एक जैसा था—रात में व्हाट्सऐप पर धमकी भरा वीडियो भेजना, फिर बैंक अकाउंट या यूपीआई आईडी देना। पीड़ित जवान डर के मारे चुप रहता था, लेकिन इस बार हिम्मत दिखाई गई।”
पुलिसकर्मियों को भी नहीं बख्शा: सुरक्षा पर उठे सवाल
इस मामले ने पुलिस महकमे के भीतर भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। गुरुग्राम पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष सुभाष बिश्नोई का कहना है, “अगर वर्दीधारी को ही निशाना बनाया जाएगा, तो आम जनता में विश्वास कैसे बनेगा? हमने कमिश्नर से माँग की है कि सभी ट्रैफिक स्टाफ को तत्काल वर्कशॉप दी जाए, जिसमें वे फर्जी आईडी की पहचान और कानूनी प्रक्रिया सीख सकें।” कमिश्नरेट ने सभी थाना प्रभारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र में विजिलेंस या एंटी-करप्शन टीम के आने पर तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों से क्रॉस-वेरिफिकेशन करें।
आगे: सख्त कानून और डिजिटल सत्यापन
पुलिस अब दोनों आरोपियों के बैंक खातों, यूपीआई हैंडल और व्हाट्सऐप चैट की फॉरेंसिक जाँच कर रही है ताकि पीड़ितों की पूरी लिस्ट तैयार हो सके। डीसीपी गर्ग ने बताया कि “हमने यूपी पुलिस, दिल्ली पुलिस और हरियाणा विजिलेंस से संपर्क किया है ताकि संयुक्त टीम बनाकर इस रैकेट के अन्य सदस्यों तक पहुँचा जा सके।” परिवहन विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि ट्रैफिक स्टाफ को हैण्ड-हेल्ड डिजिटल वेरिफिकेशन डिवाइस दी जाए, जिसमें क्यूआर कोड स्कैन करते ही अधिकारी की वैधता सामने आ जाए। फिलहाल, गुरुग्राम पुलिस का साफ संदेश है—“फर्जी विजिलेंस बनकर वसूली करने वालों के लिए कोई जगह नहीं; वर्दी अब और मज़बूत होकर उठेगी।”



