नई दिल्ली। भारतीय सड़कों पर अब एक मूक क्रांति हो रही है। वह परिचित स्पेयर (स्टेपनी) टायर, जो दशकों से कार की पिछली डिकी का एक अटूट हिस्सा रहा है, अब धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। बता दे कि यह परिवर्तन सरकारी नियमों में पांच साल पहले किए गए एक संशोधन का नतीजा है, जिसे अब ऑटो मैन्युफैक्चरर्स बड़े पैमाने पर लागू अब कर रहे हैं।
गायब हो रहा स्टेपनी टायर नियमों में बदलाव की शुरुआत
साल 2020 में केंद्रीय मोटर व्हीकल नियमों (CMVR) में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया गया। इसके तहत यह प्रावधान किया गया कि अगर किसी पैसेंजर वाहन में ट्यूबलेस टायर, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS) और एक पंचर रिपेयर किट मौजूद है, तो उसे स्टेपनी टायर के साथ बेचना जरूरी बिलकुल नहीं होगा। शुरुआत में यह अवधारणा अटपटी लगती थी, लेकिन आज यह न सिर्फ प्रीमियम कार्स, बल्कि मुख्यधारा की कारों में भी तेजी से स्वीकार भी की जा रही है। यह प्रथा यूरोपीय बाजारों में काफी समय से चलन में है।
ऑटो कंपनियों ने अपनाई नई राह
टाटा मोटर्स जैसे प्रमुख निर्माताओं ने अपनी छोटी इलेक्ट्रिक कारों, जैसे पंच EV और टियागो EV, के साथ-साथ हैरियर और सफारी जैसी अपनी प्रमुख एसयूवी में भी स्पेयर टायर को वैकल्पिक अब बना दिया है। वहीं, मारुति सुजुकी ने फ्रोंक्स और ग्रैंड विटारा के चुनिंदा वेरिएंट्स में इसी मॉडल को अपनाया है। मारुति सुजुकी विक्टोरिस तो वह पहली कार बन गई है, जिसने अपने सभी वेरिएंट से स्पेयर टायर को पूरी तरह हटा दिया है।
स्पेयर टायर हटाने के पीछे के तर्क
देश भर में सड़कों की गुणवत्ता में लगातार सुधार हो रहा है. वही आज का कार मालिक वाहन रखरखाव को लेकर अधिक जागरूक और जिम्मेदार है। टायरों की गुणवत्ता और स्थायित्व में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। PMS सिस्टम और पंचर रिपेयर किट जैसी सुविधाएँ अब कार में ही उपलब्ध हैं। टायर रिपेयर की दुकानों तक पहुंच आसान हुई है और मरम्मत की प्रक्रिया भी सरल हुई है। खाली हुए स्थान का इस्तेमाल अब सीएनजी किट जैसी अन्य सुविधाओं को समायोजित करने के लिए किया जा रहा है।
गायब हो रहा स्टेपनी टायर को लेकर ग्राहकों की चिंताएँ और भविष्य
हालाँकि, कई पारंपरिक कार मालिक इस बदलाव से असंतुष्ट हैं। उनके लिए स्टेपनी टायर एक सुरक्षा कवच की तरह भी है, विशेष रूपसे लंबी सड़क यात्राओं के दौरान। यह स्वीकार करते हुए कि भारत की सड़कें, खासकर मानसून के बाद, अभी भी आदर्श नहीं हैं, यह भी सच है कि राजमार्ग पहले से कहीं बेहतर हुए हैं। जब इन बेहतर सड़कों को उन्नत टायरों और TPMS जैसी तकनीक के साथ जोड़ा जाता है, तो ऑटो कंपनियों का यह कदम एक सोची-समझी रणनीति भी लगती है, भले ही यह कुछ उपभोक्ताओं को भारी पड़ रही हो।



