Right hand drive system: भारत में वाहनों का दाईं ओर स्टीयरिंग और सड़क (Right hand drive system) के बाईं तरफ चलना एक सामान्य व्यवस्था लगती है। यह ‘राइट-हैंड-ड्राइव’ (आरएचडी) प्रणाली देश की परिवहन संस्कृति का अभिन्न अंग है। जहां दुनिया के अधिकांश देश लेफ्ट-हैंड-ड्राइव (एलएचडी) अपनाते हैं, वहीं भारत समेत लगभग 75 देशों में यह अलग प्रचलन है। यह केवल एक ऐतिहासिक विरासत ही नहीं, बल्कि आज देश के लिए एक रणनीतिक औद्योगिक लाभ बन चुका है।
Right hand drive system के पीछे ब्रिटिश विरासत का प्रभाव
भारत में इस प्रणाली की जड़ें ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हैं। 19वीं शताब्दी में जब मोटर वाहन भारत आए, तब ब्रिटेन में बाईं ओर चलने की परंपरा पहले से प्रचलित थी। यह परंपरा मध्ययुगीन यूरोप की सैन्य प्रथा से जुड़ी थी, जहां घोड़े पर सवार लोग बाईं ओर रहते थे ताकि उनका दायाँ हाथ (जिससे हथियार चलाए जाते थे) विपरीत दिशा में आने वाले के लिए मुक्त रहे। ब्रिटिश शासनकाल में भारत में विकसित सड़क अवसंरचना, यातायात नियम और वाहन डिजाइन इसी प्रणाली के अनुरूप ढल गए।
Right hand drive system को बदलना मुस्किल
1947 के बाद देश के सामने इस व्यवस्था को बदलने का विकल्प था। हालाँकि, तत्कालीन नेतृत्व ने इसे जारी रखने का सुविचारित निर्णय लिया। इसका प्रमुख कारण व्यावहारिकता थी – पूरे देश की सड़कों, यातायात संकेतों, ड्राइविंग प्रशिक्षण प्रणाली और उभरते वाहन उद्योग को बदलने में अत्यधिक खर्च, जटिलता और दुर्घटनाओं का जोखिम था। करोड़ों ड्राइवरों के लिए पुनः प्रशिक्षण की आवश्यकता और आम भ्रम की स्थिति से बचने के लिए निरंतरता को ही सुरक्षित एवं समझदारी भरा मार्ग माना गया।
Right hand drive system एक वैश्विक विनिर्माण एवं निर्यात हब
कालांतर में यह ऐतिहासिक निर्णय भारत को एक अप्रत्याशित रणनीतिक लाभ प्रदान कर गया। भारत आज दुनिया के प्रमुख राइट-हैंड-ड्राइव वाहन निर्माता केंद्रों में से एक बन गया है। चूंकि यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका के कई देशों सहित एक बड़ा वैश्विक बाजार इसी प्रणाली का अनुसरण करता है, भारत के लिए इन देशों को वाहन निर्यात करना स्वाभाविक रूप से सुगम हो गया है।
Right hand drive system में बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं पड़ती
एक समान मानक के कारण, भारतीय विनिर्माताओं को उत्पादन लाइन, डिजाइन और आपूर्ति श्रृंखला में बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे लागत कम होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय वाहनों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। भारत में विकसित कुशल कार्यबल, मजबूत घटक आपूर्ति नेटवर्क और इस क्षेत्र में तकनीकी दक्षता ने देश को आरएचडी वाहनों का एक विश्वसनीय वैश्विक हब बना दिया है।
इस प्रकार, भारत की राइट-हैंड-ड्राइव व्यवस्था केवल एक ऐतिहासिक औपनिवेशिक निशानी नहीं रह गई है। यह एक ऐसा व्यावहारिक निर्णय सिद्ध हुआ है जिसने स्थिरता और सुरक्षा को बनाए रखा। आज यह देश के ऑटोमोटिव उद्योग को एक विशिष्ट वैश्विक बढ़त प्रदान करता है, जिससे निर्यात बढ़ रहा है और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है। यह इतिहास और आधुनिक आर्थिक रणनीति का एक अनूठा समागम है।


