Haryana News, कुरुक्षेत्र किसान न्यूज़ – हरियाणा सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए इस बार जो सख्ती दिखाने का ऐलान किया था, उसकी पहली और ठोस मिसाल राज्य के कुरुक्षेत्र जिले में देखने को मिली है। जिले के गाँव अजरावर में एक किसान द्वारा दो एकड़ खेत में फसल अवशेष (पराली) जलाए जाने के मामले में कृषि विभाग ने कड़ी कार्रवाई करते हुए उस पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया है और पुलिस में FIR दर्ज करवाई है। सबसे बड़ी सजा यह रही कि किसान के रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ कर दी गई है, जिसके चलते अगले दो साल तक वह अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर नहीं बेच सकेगा।
किसान जानें क्या है ‘रेड एंट्री’ का मतलब?
‘रेड एंट्री’ यानी किसान का नाम सरकारी रिकॉर्ड में एक डिफॉल्टर के तौर पर दर्ज हो जाना। इसके परिणामस्वरूप, किसान को अगले दो वर्षों तक MSP पर अपनी फसल बेचने का अधिकार नहीं मिलेगा।इसके बाद सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में भी बाधा उत्पन्न हो सकती है।
यह कदम अन्य किसानों के लिए एक सबक के रूप में देखा जा रहा है कि पराली जलाने की गलती की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
666 अधिकारियों की टीम कर रही है निगरानी
इस एक घटना के बाद भी कृषि विभाग निगरानी के अपने इंतजाम और तेज कर दिए हैं। जिले के 54 हजार किसानों पर नजर रखने के लिए 666 अधिकारियों और कर्मचारियों की एक विशेष टीम तैनात की गई है। इसके अलावा, सेटेलाइट इमेजरी के जरिए भी लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है, ताकि कहीं भी आग लगने की घटना का तुरंत पता लगाया जा सके।
गांवों को ‘रेड’ और ‘यलो’ जोन में बांटा
अब कृषि विभाग ने जिले के गांवों को जोखिम के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुमथला गहू और किरमिच गांवों को ‘रेड जोन’ (उच्च जोखिम वाले क्षेत्र) में रखा गया है, जबकि 20 गांव ‘यलो जोन’ (मध्यम जोखिम वाले क्षेत्र) में हैं।रेड जोन: यहां निगरानी और सख्ती सबसे ज्यादा है। ‘रेड जोन’ के गांवों में हर 50 किसानों पर एक अधिकारी की ड्यूटी लगाई गई है। अन्य क्षेत्र: जिले के बाकी इलाकों में हर 100 किसानों पर एक अधिकारी तैनात किया गया है।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र का यह मामला साफ संदेश देता है कि इस बार पराली जलाने पर सरकार कोई रियायत नहीं देने वाली। सीधे जुर्माने और पुलिस केस से आगे बढ़कर ‘रेड एंट्री’ जैसा दंड इस बात का प्रमाण है कि प्रदूषण रोकने के लिए सरकार गंभीर है। हालाँकि, सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ सख्ती से ही समस्या का समाधान हो पाएगा? किसानों को पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त और सस्ते विकल्प मुहैया कराना भी उतना ही जरूरी है। आने वाले दिन दिखाएंगे कि यह दंडात्मक रवैया कितना कारगर साबित होता है और किसानों को वैकल्पिक समाधान कितने प्रभावी ढंग से मिल पाते हैं।



