UP Electricity Bill:लखनऊ। अगर आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं और बिजली का उपयोग करते हैं, तो इस फरवरी आपके बटुए पर बोझ बढ़ सकता है। जनवरी में खपत की गई बिजली के लिए आने वाले बिल में 10% अतिरिक्त फ्यूल सरचार्ज जोड़ा जाएगा। इसका मतलब साफ है—घरेलू, व्यावसायिक और उद्योगिक सभी उपभोक्ताओं को करीब 616 करोड़ रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ेंगे।
बिजली कंपनियों का फैसला, UP उपभोक्ता परिषद का विरोध
राज्य की बिजली कंपनियों ने इस अतिरिक्त शुल्क को ‘फ्यूल सरचार्ज’ के नाम से बिलों में जोड़ने का फैसला किया है। लेकिन, इस फैसले ने उपभोक्ताओं की नाराजगी को जन्म दिया है। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इसे “असंवैधानिक” बताते हुए विद्युत नियामक आयोग में आपत्ति दर्ज कराई है।
परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है, “जब नियामक आयोग ने नवंबर में अधिकतम बिजली खरीद दर 4.94 रुपये प्रति यूनिट तय की थी, तब 5.79 रुपये में बिजली खरीदना समझ से परे है। यह सीधे-सीधे उपभोक्ताओं पर अनावश्यक बोझ डालने जैसा है।”
UP में गर्मियों में सस्ती, सर्दियों से महंगी—बिजली की अजीब गणित
वर्मा ने सवाल उठाया कि अप्रैल-मई जैसे चरम गर्मी महीनों में जब बिजली की मांग सबसे ज्यादा होती है, तब UP में बिजली 4.76 रुपये प्रति यूनिट मिली थी। फिर नवंबर जैसे सामान्य महीने में इतनी महंगी बिजली क्यों खरीदी गई? उन्होंने मांग की है कि नियामक आयोग इस पूरी प्रक्रिया की जांच करे और फ्यूल सरचार्ज पर तत्काल रोक लगाए।
उपभोक्ता पहले भी दे चुके हैं—अब और नहीं
रोचक बात यह है कि UP देश का पहला राज्य है जहां बिजली कंपनियों पर उपभोक्ताओं का 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का सरप्लस बकाया है। ऐसे में उपभोक्ता परिषद का कहना है कि जब उपभोक्ता कंपनियों को पहले ही अतिरिक्त राशि दे चुके हैं, तो अब और अतिरिक्त शुल्क वसूलना बिल्कुल न्यायसंगत नहीं है।
आगे क्या?
फिलहाल, UP में बिजली कंपनियों ने फरवरी बिलों में फ्यूल सरचार्ज जोड़ने की तैयारी कर ली है। लेकिन, उपभोक्ता परिषद की याचिका पर अगर नियामक आयोग हस्तक्षेप करता है, तो संभव है कि यह अतिरिक्त बोझ टल भी सकता है। उपभोक्ताओं को सलाह है कि वे अपने बिलों की जांच जरूर करें और यदि फ्यूल सरचार्ज जोड़ा गया हो, तो वे स्थानीय बिजली कार्यालय या उपभोक्ता हेल्पलाइन से शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
फरवरी का बिजली बिल सिर्फ एक महीने का खर्च नहीं, बल्कि एक बड़े सिस्टमिक मुद्दे की ओर इशारा करता है—जहां पारदर्शिता, जवाबदेही और उपभोक्ता हितों की रक्षा सबसे जरूरी है। क्या नियामक आयोग इस मामले में कोई बड़ा फैसला लेता है, यह देखना अब सबकी निगाह में होगा।



