Haryana Halchal- सिरसा जिले के पनिहारी गांव के समीप घग्गर नदी पर निर्माणाधीन एक पुल को लेकर ग्रामीणों और लोक निर्माण विभाग (PWD) के बीच अब तकरार छिड़ गई है. स्थानीय गाँव के निवासियों का आरोप है कि मूल योजना के अनुसार यह पुल पनिहारी-अलीकां सड़क को जोड़ने के लिए स्वीकृत हुआ था, लेकिन निर्माण के दौरान इसकी दिशा बदलकर रंगा-रोडी रोड की ओर कर दी गई है.
इस बदलाव का सीधा असर अलीकां गांव के लगभग 70 परिवारों पर पड़ा है. उनकी सीधी संपर्क अब सड़क कट गई है और अब उन्हें पुल तक पहुंचने के लिए लगभग 10 किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है. उल्लेखनीय है कि इस पुल की घोषणा वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री घोषणा पत्र के अंतर्गत की गई थी और वर्ष 2020 में इसके निर्माण हेतु 13 करोड़ 72 लाख रुपये की प्रशासनिक मंजूरी भी स्वीकार कर दी गई थी.
योजना में बिना बताए बदलने का आरोप
जब निर्माण कार्य आरंभ हुआ तो ग्रामीणों ने पाया कि पुल का निर्माण उस स्थान पर नहीं हो रहा है, जिसका मूल रूप से प्रस्ताव था. इस संदेह के आधार पर, ग्रामीणों ने 17 जुलाई, 2025 को PWD विभाग के समक्ष सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी. विभाग द्वारा प्रदान किए गए दस्तावेजों में इस पुल को स्पष्ट रूप से “पनिहारी-अलीकां रोड” पर दर्शाया गया है. इन आधिकारिक कागजातों में कहीं भी रंगा-रोडी रोड का जिक्र बिलकुल नहीं मिलता.
अलीकां गांव के देवेंद्र संधू, बलदेव सिंह पंच और कुलदीप सिंह जैसे स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग मनमाने ढंग से रंगा-रोडी रोड को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि योजना विशेष रूप से उनके गांव की कनेक्टिविटी सुधारने के लिए बनी थी. उनका तर्क है कि नदी के दोनों किनारों पर सड़कें पंचायती भूमि से होकर गुजरती हैं, लेकिन विभाग केवल एक ही दिशा में तकनीकी समस्या का हवाला अब दे रहा है.
PWD विभाग ने रखा अपना पक्ष
वहीं, इस मामले में PWD के कार्यकारी अभियंता कमल दीप सिंह राणा का कहना है कि रंगा-रोडी रोड एक विभागीय स्वीकृत सड़क है. उनके अनुसार, यदि पुल को सीधे अलीकां की ओर जाने वाले मार्ग से जोड़ा जाता, जो कि पंचायत भूमि पर स्थित है, तो वह स्थान दुर्घटना-संभावित क्षेत्र (एक्सीडेंटल जोन) भी बन सकता था. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अलीकां गांव की कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने भूमि अधिग्रहण का एक प्रस्ताव भी तैयार कर लिया है.
पुल को लेकर ग्रामीणों के गंभीर आरोप
ग्रामीणों की ओर से एक और गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि विभाग ने पहले से मौजूद एक पुराने पुल को भी ध्वस्त कर दिया है. इस पुल का निर्माण वर्ष 2015 में ग्रामीणों ने अपने स्वयं के चंदे से लगभग 90 लाख रुपये की लागत से करवाया था. ग्रामीणों का कहना है कि न केवल उनकी सीधी पहुंच छीन ली गई है, बल्कि उनके स्वयं के संसाधनों से बनी संपत्ति भी नष्ट कर दी गई है.
जिला प्रशासन से मांगी गई जांच
इस पूरे मामले में ग्रामीणों ने जिला उपायुक्त शांतनु शर्मा के समक्ष एक विस्तृत शिकायत प्रस्तुत करके निष्पक्ष जांच की मांग की है. उनका तर्क है कि यदि पुल का निर्माण मूल योजना के अनुरूप हुआ होता तो न केवल गांव की संपर्क सड़क बनी रहती, बल्कि विभाग को अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के झंझट और खर्च से भी बचना पड़ता. ग्रामीणों का यह सवाल भी है कि यदि विभाग को वास्तव में कोई तकनीकी कठिनाई थी, तो उसने पहले ग्राम सभा से चर्चा करके कोई समाधान क्यों नहीं निकाला.
पुल निर्माण यह विवाद सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और स्थानीय समुदाय की सहमति के महत्व को साफ़ दिखाता है.अब स्थानीय ग्रामीणों की उम्मीद है कि जिला प्रशासन द्वारा की गई जांच इस मामले का न्यायसंगत समाधान प्रस्तुत करेगी.



