Trump on H-1B Visa, वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वर्क वीजा प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव करते हुए एक बड़ा ऐलान किया है। ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा के लिए आवेदन शुल्क में भारी बढ़ोतरी करते हुए इसे 1 लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) करनेकी घोषणा को जारी किया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी ने इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि यह ट्रंप की इमिग्रेशन नीति का हिस्सा है।
H-1B वीजा पर वेतन-आधारित चयन प्रक्रिया होगी लागू
ट्रंप 2.0 में H-1B वीजा प्रणाली में दो बड़े बदलाव किए गए हैं। पहला, अब वीजा का आवंटन लॉटरी सिस्टम के बजाय वेतन-आधारित चयन प्रक्रिया (wage-based selection) के आधार पर तय होगा। दूसरा, आवेदन शुल्क को बढ़ाकर 1 लाख डॉलर कर दिया गया है। इसका सीधा असर IT में जॉब कर रहे भारतीय पर पड़ेगा, जो H-1B वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी हैं।
भारतीय लोगो को भारी झटका
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 2023 में भारतीय पेशेवरों को 1,91,000 H-1B वीजा जारी किए गए थे, जबकि 2024 में यह संख्या बढ़कर 2,07,000 तक हो गई। इनमें से अधिकांश आईटी, सॉफ्टवेयर और इंजीनियरिंग क्षेत्रों से जुड़े थे। नए नियम लागू होने के बाद वरिष्ठ पेशेवरों को कुछ लाभ हो सकता है, लेकिन फ्रेशर्स के लिए अमेरिका में नौकरी पाने का सपना देखना अब मुश्किल हो जाएगा।
‘गोल्ड कार्ड’ वीजा कार्यक्रम की घोषणा
ट्रंप प्रशासन ने एक नए ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा कार्यक्रम की भी घोषणा भी की है। इसके तहत केवल उच्च कौशल वाले पेशेवरों और उद्यमियों को प्राथमिकता दी जाएगी जो अमेरिका में व्यवसाय स्थापित कर सकें और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकें। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक के अनुसार, यह कार्यक्रम अमेरिकी खजाने के लिए 100 बिलियन डॉलर से अधिक की आमदनी जुटाएगा।
भारत-अमेरिका संबंधों पर प्रभाव की आशंका
वही विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ सकता है। भारतीय आईटी कंपनियां, जो अमेरिकी बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, उनके लिए यह फैसला एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। साथ ही, हज़ारों भारतीय छात्रों और युवा पेशेवरों के अमेरिका जाने के सपने चकनाचूर हो सकते हैं।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह फैसला अमेरिकी नागरिकों के हित में लिया गया है ताकि उनकी नौकरियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, आलोचक इसे अमेरिका में प्रतिभा के प्रवाह को रोकने वाला कदम भी मान रहे हैं। अब देखना यह है कि इस फैसले का भारतीय आईटी उद्योग और द्विपक्षीय संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है।



