Haryana Halchal डेस्क- बारिश के मौसम में यमुना नदी में बहने वाले अतिरिक्त पानी को अब राजस्थान की सूखी जमीन तक पहुँचाने के लिए हरियाणा सरकार ने औपचारिक सर्वे शुरू कर दिया है। हथिनी कुंड बैराज से राजस्थान के सीकर जिले तक विशाल पाइप लाइन बिछाने की योजना पर हरियाणा सिंचाई विभाग ने अपनी विशेष टीम उतार दी है। टीम यमुनानगर, करनाल, कैथल और हिसार सर्किल के अधिकारियों से बनी है और वह अपने-अपने क्षेत्रों में पाइप लाइन के संभावित मार्ग का व्यापक सर्वे कर रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी। इसके आधार पर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार की जाएगी, जिससे प्रोजेक्ट की व्यवहारिकता और लागत का सटीक आकलन हो सकेगा।
राजस्थान की रिपोर्ट को हरियाणा ने उतारा मैदान पर
राजस्थान की ओर से पहले ही एक कंसल्टेंसी एजेंसी द्वारा प्राथमिक सर्वे किया जा चुका है, जिसकी रिपोर्ट को अब हरियाणा के इंजीनियर वास्तविक स्थल पर जाकर क्रॉस-वेरिफाई कर रहे हैं। यमुनानगर में यह काम लगभग पूरा हो चुका है, जबकि अन्य जिलों में प्रक्रिया जारी है। जगाधरी सर्कल के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर रवि शंकर मित्तल के अनुसार, “वर्तमान में राजस्थान की रिपोर्ट को आधार बनाकर परियोजना का विस्तृत तकनीकी अध्ययन किया जा रहा है। हम पाइप लाइन के रूट को फाइनल कर रहे हैं ताकि भविष्य में कोई भी गाँव या शहर इसके मार्ग में न आए।”
पाइप लाइन का दायरा बढ़ा: 263 से 300 किमी हुई दूरी
प्रारंभिक प्रस्ताव के अनुसार पाइप लाइन लगभग 263 किमी लंबी होनी थी और 2700 एमएम के पाइप इस्तेमाल किए जाने थे। लेकिन सर्वे में सामने आया कि कई गाँव व शहर पाइप लाइन के मार्ग में आ रहे हैं, जिन्हें बाईपास करना आवश्यक है। इसी वजह से पाइप लाइन की लंबाई बढ़ाकर 300 किमी से अधिक कर दी गई है और पाइप का आकार भी बढ़ाकर 3600 एमएम कर दिया गया है। इससे पानी की मात्रा भी बढ़ेगी और दबाव भी कम रहेगा। सिंचाई विभाग के अनुसार, इस पाइप लाइन से वार्षिक 1.2 अरब घन मीटर पानी स्थानांतरित किया जा सकेगा।
राजस्थान तक पानी पहुँचने की अनुमानित लागत 28 हजार करोड़ तक
जमीन अधिग्रहण, पाइप लाइन बिछाने और सिविल वर्क पर लगभग 28 हजार करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। अंतिम लागत डीपीआर तैयार होने के बाद तय होगी। यह परियोजना दोनों राज्यों में जल प्रबंधन को नई दिशा दे सकती है और सिंचाई के लिए स्थायी समाधान प्रदान कर सकती है। वित्त विभाग के सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक वित्तीय स्वीकृति के लिए नोट तैयार किया जा रहा है और केंद्र सरकार से भी 60% केंद्रीय अनुदान की मांग की जाएगी। यदि सब कुछ योजना अनुसार रहा तो 2027-28 तक टेंडर जारी हो सकते हैं और 2032 तक पानी की पहली बूंद सीकर की सूखी जमीन पर गिर सकती है।
पानी को लेकर किसानों में उत्साह, पर्यावरणीय चिंताएँ भी
राजस्थान के सीकर जिले के किसान राधेश्याम बेनीवाल बताते हैं, “अगर यमुना का पानी आ गया तो मेरी 12 बीघा जमीन पर गेहूँ की जगह सब्जियाँ लगाऊँगा। सूखे में तो जान ही निकल जाती है।” पर्यावरणविद् डॉ. अनिल पुरोहित चेतावनी देते हैं, “पानी लाना ठीक है, लेकिन हथिनी कुंड से निकालने से यमुना का डाउनस्ट्रीम इकोलॉजी प्रभावित हो सकता है। हमने सरकार से मांग की है कि एनवायरनमेंटल फ्लो रिलीज़ का प्रावधान रखा जाए।”
हथिनी कुंड से सीकर तक 300 किलोमीटर का यह पाइपलाइन प्रोजेक्ट केवल सिंचाई नहीं, बल्कि पानी की न्यायसंगत बँटवारे की एक नई परिभाषा हो सकता है। 28 हजार करोड़ की लागत भारी लगती है, लेकिन अगर इससे दो राज्यों की सूखी जमीन सींची जा सके और हजारों किसानों की आय दोगुनी हो, तो यह निवेश सार्थक है। अब देखना है कि डीपीआर कब तैयार होती है और केंद्र कितना अनुदान देता है। फिलहाल, यमुनानगर की धरती पर सर्वे का काम जारी है—हर कदम पानी की ओर।



